Sunday, March 3, 2024
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झीरम घाटी हत्याकांड का दर्द: झीरम में नक्सलियों के हमले में घायल कांग्रेस नेता ने अमित शाह से मांगा न्याय, कहा- NIA से छत्तीसगढ़ सरकार की SIT को दिलाएं केस के दस्तावेज…

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की गाड़ियों पर माओवादियों ने हमला किया था। उन्हें झीरम घाटी में फंसाकर रोका गया। नेताओं की नृशंस हत्या की गई। इस जनसंहार में प्रदेश  कांग्रेस की पहली पंक्ति के अधिकतर नेता मारे गए थे। कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश बताती रही है। - Dainik Bhaskar

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की गाड़ियों पर माओवादियों ने हमला किया था। उन्हें झीरम घाटी में फंसाकर रोका गया। नेताओं की नृशंस हत्या की गई। इस जनसंहार में प्रदेश कांग्रेस की पहली पंक्ति के अधिकतर नेता मारे गए थे। कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश बताती रही है।

  • केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर रखी मांग, NIA पर जांच पूरी नहीं करने का आरोप
  • 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सलियों ने किया था हमला, कई नेता मारे गये थे

रायपुर/ बस्तर की झीरम घाटी में आठ साल पहले कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए नक्सलियों के हमले और जनसंहार के जख्म पर अभी न्याय का मरहम नहीं लग पाया है। हमले में घायल कांग्रेस नेता और झीरम घाटी संयोजक दौलत रोहड़ा ने केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर न्याय की मांग की है। रोहड़ा ने इस मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से वापस लेकर छत्तीसगढ़ सरकार की बनाए पुलिस के विशेष जांच दल (SIT) को सौंपने की मांग की है।

रोहड़ा ने लिखा है, करीब आठ वर्ष पहले 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर नक्सली हमला हुआ था। जिसमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेन्द्र कर्मा सहित 27 लोगों की हत्या कर दी गई थी। दर्जनों लोग घायल हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसकी जांच NIA से कराने के निर्देश दिए थे। NIA यहां 5 जून 2013 को आई। जगदलपुर में वन विभाग के रेस्ट हाउस को अपना कार्यालय बना कर जांच शुरू किया। रोहड़ा ने लिखा, NIA ने अपना पहला आरोप पत्र बिलासपुर उच्च न्यायालय में 23 सितम्बर 2014 को पेश किया। एक साल बाद यानी 16 सितम्बर 2015 को अपनी आखिरी आरोपपत्र भी प्रस्तुत कर दिया। उन्होने कहा, NIA का यह आरोपपत्र संपूर्ण नहीं था। हमारा आरोप है कि झीरम घाटी एक राजनीतिक साजिश थी और जांच एजेंसी ने हम घायलों, मृतकोें के परिजनों से तो कोई पूछताछ ही नहीं की। जमीनी स्तर पर कोई जांच ही नहीं की गई थी।

CBI जांच की मांग की थी अनसुनी रह गई

कांग्रेस नेता दौलत रोहड़ा ने लिखा, पीड़ितों और उनके परिजनों ने CBI जांच की मांग की। इसे अनसुना किया जाता रहा। 16 अप्रेल 2016 को तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह रायपुर आये थे। हम लोगों ने उनसे मिलने की कोशिश की, नहीं मिलने दिया गया। विधानसभा में विपक्ष का दबाव पड़ा तो तत्कालीन सरकार ने घोषणा की लेकिन केंद्र सरकार ने जांच को मंजूरी नहीं दी।

SIT बनी तो दस्तावेज नहीं मिले

दिसम्बर 2018 में कांग्रेस की सरकार बन गई। जनवरी 2019 में झीरम घाटी कांड की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन हुआ। लेकिन अभी तक NIA ने FIR और जांच से जुड़े दूसरे दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए हैं। ऐसे में जांच शुरू नहीं हो पाई है। रोहड़ा ने लिखा, यह दस्तावेज NIA से SIT को दिलाएं ताकि झीरम घाटी का सच सामने आ सके और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

मुख्यमंत्री भी कई बार मांग चुके

राज्य सरकार की ओर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी कई बार NIA से यह दस्तावेज SIT को दिलाए जाने की मांग कर चुके। जनवरी 2020 में रायपुर में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सामने झीरम घाटी कांड की जांच के अधूरे रह जाने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने गृहमंत्री ने NIA से केस डायरी वापस दिलाने की मांग रखी थी।

  • Krishna Baloon
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