काबुल: अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। तालिबानी डॉक्टरों को धमकी देते हैं कि दवा दी तो क्लीनिक बंद करा देंगे।
देशभर में क्लीनिक भी बंद हो रहे हैं। महिलाओं को गर्भधारण या मिसकैरेज का इलाज नहीं मिल पा रहा। बदगीस प्रांत की एक निजी क्लीनिक में चेतावनी देते हुए सभी दवाएं नष्ट कर दी गईं।
जवजजान प्रांत में 30 साल से क्लीनिक चला रही एक डॉक्टर कहती हैं, तालिबान के सत्ता आने के बाद गर्भनिरोधक गोली तेजी से खत्म हो रही हैं। यहां 70 में से 30 महिलाओं को इसकी जरूरत होती थी, अब हम कह देते हैं कि हमारे पास कुछ भी नहीं है। कंधार प्रांत सहित कई जगहों पर सीधे पुरुष डॉक्टरों से इलाज लेने पर सख्ती है।

2021 में तालिबान, अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुआ था। इसके बाद से वहां महिलाओं की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए कई कानून लागू किए गए हैं।
ये तीन कहानियां, जो उम्रभर का दर्द बढ़ा रहीं
उम्र 36 साल, 9 बच्चे: 36 साल की परवाना अब अपने बच्चों को पहचान ही नहीं पाती। कंधार के गांव में अपनी मां के घर पर बैठी, वह चुपचाप हिलती रहती हैं। नौ बार गर्भवती और छह बार मिसकैरेज हो चुका है। पति और ससुराल वालों के दबाव में परवाना मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुकी हैं। उनकी मां शरीफा कहती हैं, उन्हें डर और लगातार प्रेगनेंसी ने तोड़ दिया है।
उम्र 42 साल, 12 बच्चे: कंधार की 42 साल की शकीबा। 12 बच्चों की मां हैं। वे बताती हैं कि अब उन्हें उठना भी मुश्किल होता है। हड्डियों में दर्द रहता है। पति किसी भी गर्भनिरोधक को लेने से साफ मना कर देते हैं।
29 साल की उम्र में ही हालत बदतर : 29 साल की जरघोना भूकंप के बाद तंबू में रहने लगी थीं। लगातार तीन दिन टॉयलेट नहीं जा सकीं। उन्हें आंत की समस्या हुई। डॉक्टरों ने चेताया कि अब गर्भवती हुई, तो जान जा सकती है। लेकिन एक साल बाद फिर गर्भ ठहर गया। बच्चे को जन्म दिया। जान तो बच गईं, लेकिन अब रक्तस्राव से जूझ रही हैं।
चिकित्सा सुविधा न के बराबर, फंडिंग भी बड़ी समस्या
संयुक्त राष्ट्र और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन(WHO) के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय फंडिंग पिछले साल कम होने से 440 से ज्यादा अस्पताल और क्लिनिक बंद हो गए। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कई घंटे चलकर क्लिनिक तक पहुंचती हैं।
महिलाएं अकेले ही घर पर जन्म देती हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली 80% महिलाएं कुपोषित हैं। उनमें एनीमिया, विटामिन की कमी और लो ब्लड प्रेशर है।
ये बड़ी पाबंदियां:
- शिक्षा: 12 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा में पढ़ाई की अनुमति नहीं। कई प्रांतों में लड़कियों के स्कूल बंद कर दिए गए हैं।
- कामकाजी महिलाओं पर रोक: कई सरकारी और निजी क्षेत्रों में महिलाएं काम नहीं कर सकतीं। डॉक्टर, नर्स, शिक्षक जैसी महिलाओं की नौकरी प्रभावित हुई।
- अकेले आना-जाना: महिलाएं घर से बाहर पुरुष अभिभावक के बिना नहीं जा सकतीं। खुला चेहरा : महिलाओं को पूर्ण हिजाब या बुर्का पहनना अनिवार्य। संगीत, खेल और मनोरंजन में महिलाओं की भागीदारी प्रतिबंधित।
2024 में खुले में बोलने पर रोक लगाई थी
अफगानिस्तान में तालिबान ने 27 अगस्त 2024 को महिलाओं को सख्त हिदायत देते हुए उनके घर से बाहर बोलने पर रोक लगा दी थी। इसके साथ ही उन्हें सार्वजनिक जगहों पर हमेशा अपने शरीर और चेहरे को मोटे कपड़े से ढकने का आदेश दिया गया था।
अंग्रेजी अखबार द गार्जियन के मुताबिक तालिबान ने इन कानूनों के पीछे की वजह देते हुए कहा है कि महिलाओं की आवाज से भी पुरुषों का मन भटक सकता है। इससे बचने के लिए महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर बोलने से पहरेज करना चाहिए।
‘पुरुष भी खुद को ढकें’
तालिबान के सुप्रीम लीडर मुल्ला हिबातुल्लाह अखुंदजादा ने नए कानूनों को मंजूरी दी थी। इन कानूनों को हलाल और हराम की दो कैटेगरी में बांटा गया है। तालिबान के इस फैसले की संयुक्त राष्ट्र संघ ने कड़ी निंदा की थी। साथ ही कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इसे लेकर आपत्ति भी जताई थी।
15 अगस्त 2021 को तालिबान को दोबारा सत्ता मिली थी
15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान की सत्ता दूसरी बार तालिबान के हाथ आई। उसी दिन से महिलाओं पर प्रतिबंध बढ़ गए थे। सबसे पहले अलग-अलग सरकारी संस्थानों में काम कर रही महिलाओं से उनकी नौकरियां छीनी गई। फिर उनकी पढ़ाई पर पाबंदियां लगाई गई। अफगानिस्तान में महिलाएं सिर्फ छठी कक्षा तक ही पढ़ाई कर सकती हैं।
न सिर्फ महिलाओं पर प्रतिबंध बल्कि तालिबान ने सत्ता में आने के बाद कई ऐसे कानून लागू किए हैं जो मानवाधिकारों के खिलाफ हैं। इनमें सबसे अहम सार्वजनिक जगहों पर सजा देना है।
क्या है अफगानिस्तान का शरिया कानून
तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद कहा था कि देश में शरिया कानून लागू होगा। दरअसल, शरिया इस्लाम को मानने वाले लोगों के लिए एक लीगल सिस्टम की तरह है। कई इस्लामी देशों में इसका इस्तेमाल होता है। हालांकि, पाकिस्तान समेत ज्यादातर इस्लामी देशों में यह पूरी तरह लागू नहीं है। इसमें रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर कई तरह के बड़े मसलों पर कानून हैं।
शरिया में पारिवारिक, वित्त और व्यवसाय से जुड़े कानून शामिल हैं। शराब पीना, नशीली दवाओं का इस्तेमाल करना या तस्करी, शरिया कानून के तहत बड़े अपराधों में से एक है। यही वजह है कि इन अपराधों में कड़ी सजा के नियम हैं।

(Bureau Chief, Korba)





