BIG NEWS: अमेरिकी कोर्ट ने कंपनी पर ₹200 करोड़ का जुर्माना लगाया, कहा- महिला को प्रेग्नेंसी में वर्क फ्रॉम होम नहीं दिया, डिलीवरी के बाद बच्चे की मौत हुई; इसके आप जिम्मेदार

              वॉशिंगटन डीसी: अमेरिका के ओहायो में प्रेग्नेंट महिला को वर्क फ्रॉम होम की अनुमति न देने के मामले में कोर्ट ने कंपनी पर 2.25 करोड़ डॉलर (₹200 करोड़) का जुर्माना लगाया है।

              महिला को ऑफिस आने की मजबूरी की वजह से समय से पहले डिलीवरी हुई थी। जिससे नवजात की कुछ घंटों में ही मौत हो गई थी।

              कोर्ट ने माना कि अगर महिला को घर से काम करने दिया जाता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। इसी आधार पर कंपनी पर यह जुर्माना लगाया गया।

              टोटल क्वालिटी लॉजिस्टिक्स कंपनी एक लॉजिस्टिक्स कंपनी है जो सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में मदद करती है।

              टोटल क्वालिटी लॉजिस्टिक्स कंपनी एक लॉजिस्टिक्स कंपनी है जो सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में मदद करती है।

              पूरा मामला समझिए…

              वर्क फ्रॉम होम की जगह बिना सैलरी छुट्टी का ऑप्शन दिया था

              चेल्सी वॉल्श नाम की महिला टोटल क्वालिटी लॉजिस्टिक्स (TQL) अमेरिकी कंपनी में काम करती थीं। फरवरी 2021 में उन्होंने वर्क फ्रॉम होम (WFH) की इजाजत मांगी थी।

              कंपनी ने उन्हें ऑफिस आकर काम करने या बिना सैलरी छुट्टी लेने का ऑप्शन दिया, जिससे उनकी इनकम और हेल्थ इंश्योरेंस पर असर पड़ता। मजबूरी में उन्हें 22 फरवरी से ऑफिस जाकर काम करना पड़ा।

              लगातार तीन दिन काम करने के बाद 24 फरवरी को उन्हें समय से पहले डिलीवरी हो गई। महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन जन्म के कुछ ही घंटों बाद उसकी मौत हो गई।

              बच्ची का जन्म 18 हफ्ते पहले हुआ

              महिला की प्रेग्नेंसी हाई-रिस्क थी और डॉक्टर ने उन्हें घर पर आराम करने और वर्क फ्रॉम होम करने की सलाह दी थी, लेकिन ऑफिस में काम करने की वजह से बच्ची का जन्म तय समय से करीब 18 हफ्ते पहले हुआ था।

              जन्म के समय वह सांस ले रही थी और उसका दिल धड़क रहा था, लेकिन करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी मौत हो गई। इसके बाद परिवार ने कंपनी के खिलाफ केस किया। उनका कहना था कि WFH की इजाजत मिलती, तो महिला को आराम मिलता और यह हादसा टल सकता था।

              मामला हैमिल्टन काउंटी की अदालत में चला, जहां जूरी ने कंपनी को दोषी माना। जहां कंपनी की जिम्मेदार मानते हुए 2.25 करोड़ डॉलर देने का आदेश दिया गया। कोर्ट ने इसे एक दुखद घटना बताते हुए कहा कि कंपनी को कर्मचारी की स्थिति को समझना चाहिए था।

              मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बच्ची का नाम मैग्नोलिया रखा गया था। जन्म के समय उसकी सांस चल रही थी और दिल भी धड़क रहा था, लेकिन करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी मौत हो गई। फाइल फोटो

              मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बच्ची का नाम मैग्नोलिया रखा गया था। जन्म के समय उसकी सांस चल रही थी और दिल भी धड़क रहा था, लेकिन करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी मौत हो गई। फाइल फोटो

              प्रेग्नेंट महिलाओं को लेकर अलग-अलग नियम

              दुनियाभर में प्रेग्नेंट महिलाओं के काम से जुड़े अधिकारों को लेकर अलग-अलग कानून हैं, लेकिन कुछ सामान्य नियम हर जगह लागू होते हैं। इन नियमों के तहत प्रेग्नेंसी के कारण किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और जरूरत पड़ने पर वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जा सकती है।

              अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह माना जाता है कि प्रेग्नेंट महिलाओं को ‘रीजनेबल अकॉमोडेशन’ यानी उचित सुविधा दी जानी चाहिए। इसमें काम के घंटे कम करना, हल्का काम देना या घर से काम करने की इजाजत शामिल हो सकती है।

              अमेरिका में प्रेग्नेंट महिलाओं को लेकर कई कानून हैं

              अमेरिका में इसे लेकर कानून और भी क्लियर हैं। प्रेग्नेंट वर्कर्स फेयरनेस एक्ट (PWFA) के तहत कंपनियों को प्रेग्नेंट कर्मचारियों को जरूरी सुविधाएं देना अनिवार्य है, जब तक इससे कंपनी को बहुत ज्यादा नुकसान न हो।

              इसके अलावा प्रेग्नेंसी डिस्क्रीमिनेशन एक्ट (PDA) के मुताबिक, प्रेग्नेंट महिलाओं के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। अगर किसी अन्य कर्मचारी को बीमारी के दौरान वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जाती है, तो प्रेग्नेंट महिला को भी समान सुविधा मिलनी चाहिए।

              कुछ मामलों में अमेरिकन्स विद डिसएबिलिटी एक्ट (ADA) भी लागू होता है। अगर गर्भावस्था से जुड़ी कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो, तो कंपनी को कर्मचारी की मदद करनी होती है, जिसमें वर्क फ्रॉम होम भी शामिल हो सकता है।

              हालांकि, हर मामले में वर्क फ्रॉम होम देना जरूरी नहीं होता। अगर काम ऐसा है जो घर से नहीं किया जा सकता या कंपनी को इससे ज्यादा नुकसान होता है, तो कंपनी मना कर सकती है। लेकिन इसके लिए उसे सही कारण बताना जरूरी होता है।

              इसके अलावा, कंपनियों को यह भी ध्यान रखना होता है कि प्रेग्नेंट महिलाओं से भारी काम न कराया जाए और उन्हें सुरक्षित माहौल दिया जाए।

              भारत में 26 हफ्ते की पेड छुट्टी मिलती है

              भारत में मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 के तहत महिलाओं को कई जरूरी अधिकार मिलते हैं। जैसे उन्हें 26 हफ्ते (करीब 6 महीने) की पेड छुट्टी मिलती है और नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।

              इस कानून के मुताबिक, अगर काम घर से किया जा सकता है और कंपनी और कर्मचारी दोनों तैयार हों, तो मेटरनिटी लीव के बाद WFH दिया जा सकता है। लेकिन WFH एक सुविधा है, जरूरी अधिकार नहीं।

              कंपनी अपनी जरूरत के हिसाब से इसे मंजूर या मना कर सकती है। हालांकि सरकार ने कंपनियों को यह सलाह दी है कि वे महिलाओं को लीव के बाद कुछ समय तक घर से काम करने दें, लेकिन यह नियम अनिवार्य नहीं है।


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