BIG NEWS: हंगरी के प्रधानमंत्री का चुनाव हारे ऑर्बन, 16 साल बाद सत्ता से बाहर, ट्रम्प और पुतिन दोनों का समर्थन हासिल था

              बुडापेस्ट: विक्टर ऑर्बन हंगरी का प्रधानमंत्री चुनाव हार गए हैं। वे 16 साल से सत्ता में थे। विपक्षी तिस्जा पार्टी के पीटर मग्यार अगले प्रधानमंत्री बनेंगे। मग्यार पहले ऑर्बन की पार्टी फिदेस से जुड़े थे, लेकिन पार्टी में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनसे अलग हो गए थे।

              ऑर्बन दुनिया के गिने-चुने नेताओं में हैं, जिनकी करीबी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से है।

              न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, इस बार के चुनाव में करीब 80% रिकॉर्ड वोटिंग हुई थी। नतीजों को बड़े राजनीतिक उलटफेर के रूप में देखा जा रहा है। इसका असर यूरोप और ग्लोबल राजनीति पर पड़ेगा।

              तिस्जा पार्टी की 138 सीटों के साथ बड़ी जीत

              BBC के मुताबिक, शुरुआती नतीजों में तिस्जा पार्टी ने 199 में 138 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं, ऑर्बन की फिदेस पार्टी को सिर्फ 55 सीटें ही मिली हैं। तिस्जा को करीब 53% और फिदेस को करीब 37% वोट मिले।

              इन चुनाव नतीजों के बाद हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में देर रात तक जश्न चलता रहा। डेन्यूब नदी किनारे हजारों लोग जुटे। कारों के हॉर्न, झंडे और नारेबाजी के बीच जश्न चलता रहा। कई जगह लोगों ने रूसियों घर जाओ जैसे नारे लगाए।

              हंगरी में जश्न की 4 तस्वीरें…

              बुडापेस्ट में देर रात पीटर मग्यार अपनी जीत का जश्न मनाते हुए हंगरी का झंडा लहरा रहे हैं।

              बुडापेस्ट में देर रात पीटर मग्यार अपनी जीत का जश्न मनाते हुए हंगरी का झंडा लहरा रहे हैं।

              मग्यार की जीत का जश्न मनाते हुए समर्थकों में भारी उत्साह दिखा।

              मग्यार की जीत का जश्न मनाते हुए समर्थकों में भारी उत्साह दिखा।

              बुडापेस्ट में हंगरी के संसदीय चुनावों के आंशिक परिणामों की घोषणा के बाद, एक व्यक्ति सड़कों पर जश्न मनाते हुए हंगरी का झंडा लहरा रहा है।

              बुडापेस्ट में हंगरी के संसदीय चुनावों के आंशिक परिणामों की घोषणा के बाद, एक व्यक्ति सड़कों पर जश्न मनाते हुए हंगरी का झंडा लहरा रहा है।

              बुडापेस्ट में देर रात तक चला जश्न, कई लोग शामिल हुए।

              बुडापेस्ट में देर रात तक चला जश्न, कई लोग शामिल हुए।

              ट्रम्प के करीबी माने जाते हैं ऑर्बन

              ऑर्बन ने अपनी हार स्वीकार कर ली है और अपने समर्थकों को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि अब वे विपक्ष से देश की सेवा करेंगे।

              ऑर्बन को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का करीबी सहयोगी माना जाता रहा है। हाल ही में उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने चुनाव से पहले हंगरी का दौरा किया था और उनका समर्थन किया था।

              ऑर्बन यूरोप में ट्रम्प के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं। 2016 में ट्रम्प के पहली बार चुनाव लड़ने की घोषणा पर ऑर्बन पहले यूरोपीय नेता थे जिन्होंने उन्हें समर्थन दिया था।

              अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया पर हंगरी चुनाव से पहले ऑर्बन का खुलकर समर्थन किया था।

              अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया पर हंगरी चुनाव से पहले ऑर्बन का खुलकर समर्थन किया था।

              ऑर्बन को पुतिन का भी समर्थक माना जाता है

              ऑर्बन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी माने जाते रहे हैं। उनकी राजनीति रूस से करीबी और यूरोपीय यूनियन से दूरी पर आधारित रही है। उन्होंने रूस पर लगे प्रतिबंधों का कई बार विरोध किया और यूक्रेन युद्ध जल्दी खत्म करने की बात कही।

              उनके आलोचकों का कहना है कि यह रुख रूस को खुश करने के लिए है। ऑर्बन ने रूस के बड़े हमले के खिलाफ यूक्रेन को समर्थन देने की यूरोपीयन यूनियन की कोशिशों में बार-बार बाधा डाली।

              साथ ही उन्होंने पुतिन से करीबी रिश्ते बनाए रखे और रूस से ऊर्जा आयात पर हंगरी की निर्भरता खत्म करने से इनकार किया

              पुतिन के भी करीबी माने जाते है ऑर्बन।

              पुतिन के भी करीबी माने जाते है ऑर्बन।

              पीटर मग्यार का राजनीतिक एजेंडा और वादे

              जीत के बाद पीटर मग्यार ने कहा कि जनता ने झूठ पर सच्चाई को चुना है। उन्होंने यूरोपीयन यूनियन (EU) और NATO के साथ रिश्ते मजबूत करने का वादा किया।

              EU यह देखेगा कि मग्यार यूक्रेन को लेकर हंगरी की नीति में क्या बदलाव करते हैं। माना जा रहा है कि विदेश नीति में बड़ा बदलाव आ सकता है।

              मग्यार ने भ्रष्टाचार खत्म करने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल करने और शिक्षा-स्वास्थ्य में सुधार की बात कही। साथ ही उन्होंने ऑर्बन काल की ‘पैट्रोनेज सिस्टम’ (NER) खत्म करने का वादा किया।

              ऑर्बन के न जीतने की क्या वजह?

              विक्टर ऑर्बन 2010 में पहली बार हंगरी की सत्ता में आए और तब से उन पर कई आरोप लगते रहे हैं। आरोप है कि सत्ता में आते ही उन्होंने सिस्टम अपने हिसाब से बदलना शुरू किया।

              उन्होंने चुनाव के ऐसे नियम तय किए कि फायदा उनकी फिदेस पार्टी को मिले। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने देश की करीब 80% मीडिया और सरकारी संस्थाओं को कंट्रोल में रखा था।

              उन्होंने EU में अपने करीबियों के लिए कई मुश्किलें पैदा की, जिससे हंगरी के कई फैसले विवादों में आ गए।


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