रायपुर : ताड़पत्रों में कैद इतिहास : कराकी गांव के शाह परिवार ने बचा रखी है सदियों पुरानी विरासत

              रायपुर (BCC NEWS 24): सरगुजा अंचल के गांवों में आज भी इतिहास सांस लेता है। कहीं लोकगीतों में, कहीं मंदिरों की दीवारों में और कहीं पुराने घरों के पूजाघरों में सहेजकर रखी गई उन धरोहरों में, जिनकी कीमत समय के साथ और बढ़ जाती है। लुण्ड्रा जनपद के ग्राम कराकी में ऐसी ही एक अनमोल विरासत सामने आई है। यहां शाह परिवार के घर में ताड़पत्रों पर लिखी उड़िया भाषा की दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं, जो अब इतिहास, संस्कृति और लोकस्मृति के महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जा रही हैं।

              पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के दौरान जब सर्वे दल कराकी गांव पहुंचा, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि एक सामान्य ग्रामीण घर में वर्षों से ऐसी धरोहर सुरक्षित रखी गई है। गांव निवासी महेश्वर शाह ने श्रद्धा और गर्व के साथ अपने पूर्वजों की इस अमानत को सर्वे टीम के सामने रखा। ताड़पत्रों के दो बंडलों में संरक्षित इन पांडुलिपियों में एक लगभग 70 पृष्ठों का है, जिसे मथुरा मंगल बताया गया, जबकि दूसरा करीब 150 पृष्ठों का बंडल भागवत के एकादश स्कंध से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

              इन पांडुलिपियों से जुड़ी सबसे रोचक बात शाह परिवार की मौखिक परंपरा है। महेश्वर शाह बताते हैं कि उनके दादाजी पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी वे इन ग्रंथों का पाठ पूरी श्रद्धा से किया करते थे। उन्हें श्लोक और पद कंठस्थ थे। यही वजह रही कि परिवार में इन ताड़पत्रों को केवल किताब नहीं, बल्कि पूजनीय धरोहर माना जाता रहा। वर्षों तक इन्हें पूजाघर में रखकर पूजा-अर्चना की जाती रही और इसी श्रद्धा ने इन्हें समय के थपेड़ों से बचाए रखा।

              हालांकि अब समय के असर इन पांडुलिपियों पर साफ दिखाई देने लगे हैं। नमी और पर्याप्त संरक्षण के अभाव में कई ताड़पत्रों पर फफूंद जम गई है। अनेक पृष्ठ आपस में चिपक चुके हैं और कुछ हिस्से अपठनीय हो गए हैं। फिर भी बड़ी संख्या में पृष्ठ अब भी सुरक्षित हैं, जिनमें प्राचीन लेखन शैली और धार्मिक साहित्य की महत्वपूर्ण सामग्री संरक्षित मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इनका वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए तो यह न केवल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देगा, बल्कि उड़िया साहित्य और मध्य भारत की सांस्कृतिक आवाजाही पर भी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा सकता है।

              पांडुलिपियों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण की दिशा में प्रशासनिक स्तर पर भी प्रयास शुरू हो गए हैं। पंचायत सचिव एवं सर्वेयर दामोदर सिंह तथा तकनीकी सहायक अजित कंवर ने पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण और डिजिटल अपलोडिंग का कार्य किया। वहीं पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के जिला सदस्य श्रीश मिश्र ने मौके पर पहुंचकर सर्वेयरों को प्रशिक्षण दिया और जियो टैगिंग की प्रक्रिया पूरी कराई। इस पूरे अभियान के समन्वय में जनपद पंचायत लुण्ड्रा की मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रीति भगत की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

              सरगुजा जैसे आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में अब भी कई परिवारों के पास ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं, जिनके बारे में व्यापक समाज को जानकारी नहीं है। कराकी गांव में मिली ये ताड़पत्र पांडुलिपियां केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण हैं, जिसने बिना किसी आधुनिक संरक्षण तकनीक के भी इतिहास को जीवित बनाए रखा। अब जरूरत इस बात की है कि ऐसी धरोहरों को केवल गांवों की सीमाओं में न रहने दिया जाए, बल्कि उनके संरक्षण, अध्ययन और डिजिटलीकरण के जरिए आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाया जाए।


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