नाइट्रोजन स्थिरीकरण से बढ़ती है भूमि की उर्वरता, कृषि विभाग दे रहा 50 प्रतिशत अनुदान
रायपुर (BCC NEWS 24): कृषि विभाग द्वारा किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ढैंचा एक दलहनी फसल है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि विभाग ने जिले के प्रचलित धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी तथा सोयाबीन आधारित फसल चक्र को ध्यान में रखते हुए किसानों को ढैंचा को हरी खाद के रूप में अपनाने की सलाह दी है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा की बुवाई मानसून के प्रारंभ में 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से की जाती है। बुवाई के लगभग 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर ऊंचाई प्राप्त कर लें तथा फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में हों, तब उन्हें ट्रैक्टर चालित डिस्क हैरो, रोटावेटर अथवा मिट्टी पलटने वाले हल की सहायता से खेत में दबाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने पर लगभग 15 से 20 दिनों में ढैंचा सड़-गलकर मिट्टी में मिल जाता है और उसके पोषक तत्व फसलों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं।
ढैंचा के विघटन से भूमि में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, जलधारण क्षमता बढ़ती है तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। इसका सकारात्मक प्रभाव आगामी फसलों की वृद्धि एवं उत्पादन पर पड़ता है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ढैंचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध होती है। इतनी नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए सामान्यतः 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार ढैंचा के उपयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत संभव है।
ढैंचा हरी खाद के रूप में अपेक्षाकृत कम लागत वाला, पर्यावरण अनुकूल तथा मिट्टी की सेहत सुधारने वाला विकल्प है। यह जैविक कार्बन एवं लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ाता है, जबकि रासायनिक यूरिया के अधिक उपयोग से दीर्घकाल में मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो सकती है तथा पर्यावरण प्रदूषण की संभावना भी बढ़ जाती है। धैचा के नियमित उपयोग से खेती की लागत कम करने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिलता है।
कृषि विभाग द्वारा हरी खाद के रूप में ढैंचा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किसानों को कुल लागत राशि पर 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। इच्छुक किसान बीज प्रक्रिया केंद्र, बीज निगम कार्यालय, कौरिनभाठा, राजनांदगांव से ढैंचा बीज प्राप्त कर सकते हैं। विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हुए ढैंचा जैसी हरी खादों का अधिकाधिक उपयोग करें, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो तथा कृषि उत्पादन को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सके।
जिले में प्रचलित विभिन्न फसल चक्रों में ढैंचा को हरी खाद के रूप में अपनाने से प्रति हेक्टेयर 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है तथा 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत संभव है। कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे मानसून प्रारंभ होते ही धैचा की बुवाई करें, 35 से 40 दिन की अवस्था में फूल आने से पूर्व इसे मिट्टी में मिला दें तथा 15 से 20 दिन बाद मुख्य फसल की बुवाई अथवा रोपाई करें। इससे भूमि की उर्वरता में वृद्धि होगी और बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

(Bureau Chief, Korba)




