मॉस्को: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने NATO देशों को चेतावनी दी है कि अगर रूस के इलाके कलिनिनग्राद पर हमला हुआ, तो रूस अपने सभी हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है। इसमें परमाणु हथियार भी शामिल हैं।
पुतिन ने गुरुवार को मॉस्को में वल्दाई फोरम के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि रूस यूरोप के किसी देश पर हमला करने की योजना नहीं बना रहा, लेकिन अपनी जमीन की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।
कलिनिनग्राद के चारों तरफ NATO देशों का घेरा
कलिनिनग्राद रूस का एक अलग इलाका है। यह रूस के मुख्य हिस्से से जुड़ा नहीं है। यह रूस की सीमा से 300 किमी दूर यूरोप में पोलैंड और लिथुआनिया के बीच स्थित है। इन दोनों देशों के साथ-साथ आसपास के कई देश NATO के सदस्य हैं।
इस वजह से रूस के लिए कलिनिनग्राद की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। रूस के बाकी हिस्से से सीधे जमीन के रास्ते यहां पहुंचने के लिए दूसरे देशों के इलाके से गुजरना पड़ता है। हालांकि, बाल्टिक सागर के रास्ते यहां पहुंचा जा सकता है।
दूसरे विश्व युद्ध से पहले इस इलाके को कोनिग्सबर्ग कहा जाता था और यह जर्मनी का हिस्सा था। युद्ध के बाद 1945 में यह सोवियत संघ के नियंत्रण में आ गया। सोवियत संघ टूटने के बाद 1991 में यह रूस का हिस्सा बना रहा।
आज रूस ने इस इलाके को अपने अहम सैन्य ठिकानों में बदल दिया है। यहां से वह बाल्टिक सागर और NATO के सदस्य देशों के आसपास अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रख सकता है।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने मॉस्को में वल्दाई इंटरनेशनल डिस्कशन क्लब के कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
पुतिन बोले- पश्चिमी देश रूस के साथ युद्ध की तैयारी कर रहे
राष्ट्रपति पुतिन ने पश्चिमी देशों और यूरोप पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश आने वाले वर्षों में रूस के साथ युद्ध की तैयारी की बात कर रहे हैं।
उन्होंने बाल्टिक सागर में सैन्य अभ्यास और रूसी जहाजों को जब्त करने का भी जिक्र किया।
उनका बयान मॉस्को की उस चेतावनी के बाद आया, जिसमें NATO से कहा गया था कि कलिनिनग्राद की रक्षा के लिए रूस परमाणु हथियार इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
पुतिन के बयान की 3 बड़ी वजहें
कलिनिनग्राद की नाकाबंदी का डर: रूस को आशंका है कि NATO समुद्र और हवा से कलिनिनग्राद की आवाजाही रोक सकता है। इससे यह इलाका रूस के बाकी हिस्से से कट जाएगा।
कलिनिनग्राद के आसपास NATO की बढ़ती सैन्य गतिविधि: बाल्टिक क्षेत्र में NATO की सैन्य गतिविधियां, अभ्यास और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर बढ़े हैं। रूस इन्हें कलिनिनग्राद के लिए खतरे के तौर पर देखता है।
रूस-NATO के सीधे युद्ध का डर: पश्चिम में रूस और NATO के बीच संभावित सीधे टकराव को लेकर चर्चा बढ़ रही है। पुतिन ने इसी संदर्भ में कहा कि रूस हमला नहीं करना चाहता, लेकिन अपनी जमीन पर हमला हुआ तो कड़ा जवाब देगा
कलिनिनग्राद रूस के लिए क्यों अहम है?
1. यहां रूस का नौसैनिक बेड़ा तैनात है
कलिनिनग्राद के बाल्टिस्क बंदरगाह पर रूस के बाल्टिक बेड़े का अहम ठिकाना है। इससे रूस को बाल्टिक सागर में अपने युद्धपोत तैनात रखने और समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलती है।
2. यहां परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइलें हैं
रूस ने यहां इस्कंदर मिसाइल प्रणाली तैनात कर रखी है। इस प्रणाली की कुछ मिसाइलें परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं। इसके अलावा यहां हवाई हमलों से बचाव और समुद्र में दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने वाली प्रणालियां भी हैं।
3. NATO के कई देश इसकी पहुंच में हैं
कलिनिनग्राद की भौगोलिक स्थिति रूस को यूरोप के इस हिस्से में सैन्य ताकत दिखाने का मौका देती है। यहां तैनात हथियारों से रूस आसपास के सैन्य ठिकानों और समुद्री रास्तों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
4. रूस के लिए यह पश्चिमी सीमा का अहम सैन्य ठिकाना है
यूक्रेन युद्ध और यूरोप में NATO की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच रूस इस इलाके को अपनी पश्चिमी दिशा की सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है।
NATO बोला- रूस पर हमले की कोई तैयारी नहीं है
NATO ने रूस की परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की चेतावनी का विरोध किया है। NATO की प्रवक्ता एलिसन हार्ट ने बुधवार को कहा, ‘हम बल प्रयोग की धमकी और गैर-जिम्मेदाराना परमाणु बयानों की कड़ी निंदा करते हैं।’
उन्होंने कहा कि NATO कलिनिनग्राद को निशाना नहीं बना रहा है। NATO एक रक्षात्मक गठबंधन है और उसकी सैन्य गतिविधियों से रूस के किसी भी इलाके को खतरा नहीं है।
NATO के चीफ मार्क रुटे ने भी रूस से परमाणु हमले की धमकियां बंद करने को कहा। उन्होंने दावा किया कि रूस चाहता है कि सदस्य देशों का ध्यान बंटे और यूक्रेन की मदद पर जोर कम हो जाए। लेकिन NATO ऐसा नहीं होने देगा।

NATO चीफ बेल्जियम के ब्रसेल्स में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान। तस्वीर 2 सितंबर 2026 की है।
बाल्टिक सागर में सैन्य गतिविधियां क्यों बढ़ रही हैं?
बाल्टिक सागर उत्तरी यूरोप का एक अहम समुद्री क्षेत्र है। इसके आसपास रूस, पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया, फिनलैंड और स्वीडन जैसे देश हैं। रूस को छोड़कर ये सभी देश NATO के सदस्य हैं।
NATO ने पिछले साल यहां ‘ऑपरेशन बाल्टिक सेंट्री’ शुरू किया था। इसका मकसद समुद्र के नीचे बिछी संचार केबल और पाइपलाइन जैसे अहम ढांचे की सुरक्षा करना है।
इस क्षेत्र में सैन्य अभ्यास और समुद्री निगरानी बढ़ने से रूस और NATO के बीच टकराव का खतरा बढ़ा है। रूस इसे अपने खिलाफ सैन्य दबाव के तौर पर देखता है, जबकि NATO इसे क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़ा कदम बताता है।


(Bureau Chief, Korba)







