कोपेनहेगन: डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने कहा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की तो NATO सैन्य गठबंधन का अंत हो जाएगा।
सोमवार रात एक टीवी इंटरव्यू में फ्रेडरिकसन ने कहा कि अगर अमेरिका किसी NATO सदस्य देश पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो NATO की पूरी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी। कुछ भी नहीं बचेगा।
वहीं फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन के नेताओं ने भी साफ कहा है कि ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क से जुड़े किसी भी फैसले का हक सिर्फ ग्रीनलैंड और डेनमार्क को ही है।
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने रविवार को दिए एक बयान में ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कही थी। वे वेनेजुएला पर किए हमले को लेकर पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान ट्रम्प ने कहा था कि वह 20 दिन में ग्रीनलैंड पर बात करेंगे।
इससे पहले भी वह कई बार ग्रीनलैंड को अमेरिका के कंट्रोल में लाने की बात कर चुके हैं। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त इलाका है, जो नाटो का हिस्सा भी है। ट्रम्प ने सैन्य कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया है।
डेनमार्क और अमेरिका दोनों ही NATO मेंबर
डेनमार्क और ग्रीनलैंड, डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा हैं। डेनमार्क साम्राज्य और अमेरिका दोनों ही NATO के सदस्य देश हैं। इन देशों की संप्रभुता और सुरक्षा की गारंटी NATO की है।
इसके तहत किसी एक सदस्य देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को पूरे गठबंधन के देशों पर हमला माना जाता है।
अमेरिका का डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ करीबी रिश्ता रहा है। डेनमार्क नाटो का संस्थापक सदस्य है। 1951 के रक्षा समझौते से अमेरिका को ग्रीनलैंड में मिलिट्री बेस रखने की अनुमति है। दोनों देश सुरक्षा, विज्ञान, पर्यावरण और व्यापार में सहयोग करते हैं।
ग्रीनलैंड PM बोले- हमारा देश बिकने वाला नहीं
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने कहा है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रीनलैंड को वेनेजुएला से जोड़कर सैन्य हस्तक्षेप की बात करते हैं, तो यह न केवल गलत है बल्कि हमारे लोगों के प्रति अनादर है।
नीलसन ने 4 जनवरी को बयान जारी कर कहा- मैं शुरू से ही शांत और स्पष्ट रूप से यह कहना चाहता हूं कि घबराहट या चिंता का कोई कारण नहीं है। केटी मिलर के पोस्ट से, जिसमें ग्रीनलैंड को अमेरिकी झंडे में लिपटा हुआ दिखाया गया है, इससे कुछ भी नहीं बदलता।
यूरोपीय नेता बोले- आर्कटिक रीजन की सुरक्षा यूरोप के लिए अहम
यूरोप के कई बड़े देशों के नेताओं ने ग्रीनलैंड को लेकर एक साथ बयान जारी किया है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क के नेताओं ने कहा है कि आर्कटिक इलाके (ग्रीनलैंड के आसपास का इलाका) की सुरक्षा यूरोप के लिए बहुत अहम है और इसका असर पूरी दुनिया की सुरक्षा पर पड़ता है।
नेताओं ने बताया कि NATO पहले ही कह चुका है कि आर्कटिक क्षेत्र उसके लिए अहम है। इसी वजह से यूरोपीय देश वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। आर्कटिक को सुरक्षित रखने और किसी भी खतरे को रोकने के लिए वहां ज्यादा गतिविधियां और निवेश किए जा रहे हैं। डेनमार्क और उसके साथ ग्रीनलैंड भी NATO का हिस्सा हैं।
बयान में कहा गया है कि आर्कटिक की सुरक्षा सभी देशों को मिलकर करनी होगी। यह काम NATO के दूसरे देशों, खासकर अमेरिका, के साथ मिलकर किया जाएगा। इसमें संयुक्त राष्ट्र के नियमों का पालन किया जाएगा, जिनमें हर देश की आजादी, उसकी जमीन की सुरक्षा और उसकी सीमाओं का सम्मान शामिल है।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका इस पूरे काम में एक अहम साझेदार है। यह साझेदारी NATO के जरिए और डेनमार्क और अमेरिका के बीच 1951 में हुए रक्षा समझौते के तहत है।
अमेरिकी अधिकारी की पत्नी के पोस्ट से भड़का विवाद
वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के ठीक बाद व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी स्टीफन मिलर की पत्नी कैटी मिलर ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड का नक्शा अमेरिकी झंडे के रंग में रंगा हुआ पोस्ट किया। इससे यह विवाद और बढ़ गया।
मिलर ने अपनी पोस्ट के कैप्शन में लिखा “जल्द ही”। इससे ग्रीनलैंड और डेनमार्क में अमेरिकी कब्जे की आशंकाएं बढ़ गईं। ट्रम्प लंबे समय से ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की बात करते रहे हैं। जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, खनिज संसाधनों और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की गतिविधियों का हवाला दिया है।
इससे पहले मार्च में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने ग्रीनलैंड के एक अमेरिकी सैन्य अड्डे का दौरा किया था और डेनमार्क पर वहां कम निवेश करने का आरोप लगाया था।

अमेरिकी अधिकारी स्टीफन मिलर की पत्नी कैटी मिलर ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड का यह मैप पोस्ट किया था, जो अमेरिकी झंडे के रंग में रंगा हुआ था।
जानिए अमेरिका को ग्रीनलैंड से क्या फायदा
- रणनीतिक सैन्य महत्व: ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, जो अमेरिका, यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है।
- चीन और रूस पर नजर: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है।
- प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इनका 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
- नई समुद्री व्यापारिक राहें: ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा।
- अमेरिकी सुरक्षा नीति: अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की “फ्रंट लाइन” मानता है। वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।
ट्रम्प ने वेनेजुएला पर हमले के लिए मोनरो डॉक्ट्रिन का हवाला दिया
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की गिरफ्तारी के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोनरो डॉक्ट्रिन का जिक्र किया। ट्रम्प ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिका की दो सौ साल पुरानी विदेश नीति के मुताबिक है।
ट्रम्प ने यह भी कहा कि मोनरो डॉक्ट्रिन अब पुरानी हो चुकी है और अमेरिका इससे भी आगे जाकर कार्रवाई कर रहा है।
मोनरो डॉक्ट्रिन की शुरुआत साल 1823 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने की थी। इसका मकसद यूरोपीय देशों को उत्तर और दक्षिण अमेरिका के मामलों में दखल देने से रोकना था।
इस नीति के तहत अमेरिका ने पूरे लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र माना। बाद में इसका इस्तेमाल कई बार लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप को सही ठहराने के लिए किया गया।

(Bureau Chief, Korba)




