Saturday, January 31, 2026

            ट्रम्प से ग्रीनलैंड को बचाने ब्रिटेन ने 1 सैनिक भेजा, 7 यूरोपीय देशों के 40 सैनिक राजधानी नुउक पहुंचे; इटली बोला- ये क्या मजाक है

            नुउक: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकियों के बीच यूरोप की ‘सैन्य एकजुटता’ अब मजाक का विषय बनती दिख रही है। ग्रीनलैंड की सुरक्षा के नाम पर ब्रिटेन ने सिर्फ 1 सैनिक भेजा है, जबकि सात यूरोपीय देशों के कुल मिलाकर करीब 40 सैनिक राजधानी नुउक पहुंचे हैं।

            रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन जैसे NATO देशों ने मिलकर ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस नाम से जॉइंट मिलिट्री ऑपरेशन शुरू किया है। ये सैनिक इसी में शामिल होने पहुंचे हैं।

            इस पूरे सैन्य अभ्यास पर सवाल उठाते हुए इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेत्तो ने इसे एक मजाक करार दिया है।

            ग्रीनलैंड में बड़े पैमाने पर सैनिकों के तैनाती की संभावना

            डेनमार्क पहले से ग्रीनलैंड में करीब 200 सैनिक तैनात किए हुए है। इसके अलावा 14 सदस्यीय सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल भी वहां मौजूद है, जो आर्कटिक इलाकों में गश्त करते हैं।

            फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि आने वाले दिनों में इन्हें जमीन, हवा और समुद्र के जरिए और मजबूत किया जाएगा। यह संख्या छोटी है, लेकिन यह राजनीतिक संदेश देने के लिए है कि NATO एकजुट है।

            डेनमार्क की अगुवाई में चल रहा ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस एक सैन्य अभ्यास है। इसका मकसद यह देखना है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने पड़े, तो उसकी तैयारी कैसी होगी। डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस अभ्यास का फोकस आर्कटिक इलाके में सहयोगी देशों के बीच तालमेल और काम करने की क्षमता बढ़ाने पर है।

            आगे चलकर इससे भी बड़ा मिशन लाने की योजना है, जिसे ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री कहा जा रहा है। यह एक नाटो मिशन होगा। इसका उद्देश्य ग्रीनलैंड और उसके आसपास के इलाकों में निगरानी बढ़ाना और किसी भी खतरे का सैन्य जवाब देने की ताकत मजबूत करना है।

            हालांकि यह मिशन तुरंत शुरू नहीं होगा। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के मुताबिक, ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री को शुरू होने में अभी कई महीने लग सकते हैं। यानी फिलहाल ग्रीनलैंड में कोई बड़ा नया सैन्य मिशन शुरू नहीं हुआ है, बल्कि उसकी तैयारी और योजना पर काम चल रहा है।

            जर्मनी के सैनिक ग्रीनलैंड के नुउक में डेनिश आर्कटिक कमांड भवन पहुंचे।

            जर्मनी के सैनिक ग्रीनलैंड के नुउक में डेनिश आर्कटिक कमांड भवन पहुंचे।

            पोलैंड, इटली ने मिशन से दूरी बनाई

            NATO के कुछ बड़े सैन्य ताकत वाले देश इस मिशन से दूर रहे। पोलैंड, इटली और तुर्किए ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने से इनकार कर दिया। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने साफ कहा कि उनका देश सैनिक नहीं भेजेगा।

            दरअसल, पोलैंड की सबसे बड़ी चिंता रूस के साथ लगी उसकी पूर्वी सीमा है। पोलैंड अपनी सैन्य ताकत को वहीं केंद्रित रखना चाहता है।

            ग्रीनलैंड में सैनिक तैनाती को लेकर नाटो का कोई सामूहिक निर्देश नहीं है। हर देश अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं और संसाधनों के हिसाब से फैसला कर रहे हैं।

            ग्रीनलैंड की अपनी सेना नहीं, अमेरिका और डेनमार्क के सैनिक तैनात

            ग्रीनलैंड की अपनी कोई सेना नहीं है। उसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क की है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। यहां का अबादी महज 57 हजार है।

            2009 के बाद, ग्रीनलैंड सरकार को तटीय सुरक्षा और कुछ विदेशी मामलों में छूट मिली है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति के मुख्य मामले अभी भी डेनमार्क के पास हैं।

            • अमेरिकी सैनिक: अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (थुले एयर बेस)। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित यह बेस अमेरिका चलाता है। यह बेस मिसाइल चेतावनी सिस्टम और स्पेस मॉनिटरिंग के लिए इस्तेमाल होता है। NYT के मुताबिक यहां करीब 150 से 200 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ये मिसाइल चेतावनी, स्पेस निगरानी और आर्कटिक सुरक्षा के लिए हैं। यह अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है।
            • डेनिश सैनिक: डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड ग्रीनलैंड में काम करती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां कुल करीब 150 से 200 डेनिश सैन्य और सिविलियन कर्मी हैं। जो निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू, और संप्रभुता की रक्षा करते हैं। इसमें प्रसिद्ध सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल (एक छोटी एलीट यूनिट, करीब 12-14 लोग) भी शामिल है, जो कुत्तों की स्लेज से लंबी गश्त करती है।

            अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाने की तैयारी में यूरोपीय देश

            दूसरी तरफ यूरोपीय यूनियन ट्रम्प के लगाए गए टैरिफ का जवाब देने की तैयारी कर रहा है। EU अमेरिका पर ट्रेड पाबंदियां लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

            इसके लिए EU एक खास कानूनी हथियार के इस्तेमाल पर सोच रहा है, जिसे अनौपचारिक तौर पर ‘ट्रेड बाजूका’ कहा जाता है। इसका मकसद उन देशों के खिलाफ कड़ा कदम उठाना है, जो यूरोपीय देशों पर जबरदस्ती आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं।

            EU में अमेरिकी उत्पादों पर 0% टैरिफ को होल्ड करने की मांग

            यूरोपीय संघ (EU) के सांसद अमेरिका के साथ हुए ट्रेड एग्रीमेंट की मंजूरी रोकने की तैयारी में हैं। यूरोपियन पीपुल्स पार्टी (EPP) के अध्यक्ष मैनफ्रेड वेबर ने शनिवार को सोशल मीडिया X पर पोस्ट कर कहा कि ट्रम्प की ग्रीनलैंड धमकियों के कारण अमेरिका से समझौते को मंजूरी देना संभव नहीं है।

            मैनफ्रेड वेबर ने सोशल मीडिया पर कहा कि EPP व्यापार समझौते के पक्ष में था, लेकिन ट्रम्प की ग्रीनलैंड धमकियों के कारण अब मंजूरी संभव नहीं। उन्होंने अमेरिकी उत्पादों पर 0% टैरिफ को होल्ड करने की बात कही।

            यूरोपीय संसद के अन्य समूह भी समझौते को फ्रीज करने की मांग कर रहे हैं। अगर फैसले को लेकर सहमति बनती है, तो समझौता रुक सकता है।

            ट्रम्प ने 8 यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाया

            डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोप के 8 देशों पर 10% टैरिफ लगा दिया है। ये देश ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कब्जे की धमकी का विरोध कर रहे थे।

            ट्रम्प ने शनिवार को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड टैरिफ के दायरे में आएंगे। इन पर 1 फरवरी से टैरिफ लागू होगा।

            उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के साथ कोई समझौता नहीं होता है, तो 1 जून से यह टैरिफ बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा। इससे पहले ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस में एक बैठक के दौरान इन देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी थी।

            यूरोपीय देश ट्रम्प पर काउंटर-टैरिफ लगाने की तैयारी में

            ट्रम्प की इस धमकी के बाद इन आठों देशों के नेता एक साथ आए और संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि टैरिफ की धमकी ट्रांसअटलांटिक संबंधों को कमजोर करती है। कई नेताओं ने इसे ब्लैकमेल करार दिया।

            रविवार को EU के राजदूतों की आपात बैठक हुई और संकट वार्ता की गई। EU के टॉप डिप्लोमैट्स ने पिछले साल ट्रम्प के साथ हुए ट्रेड डील के बाद निलंबित किए गए 93 अरब यूरो के अमेरिकी सामान पर काउंटर-टैरिफ को फिर से शुरू करने की योजना पर चर्चा की।

            फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने EU से अपने सबसे शक्तिशाली हथियार ‘एंटी-कोएर्शन इंस्ट्रूमेंट’ (बिग बजूका) को सक्रिय करने की अपील की, जो आर्थिक जबरदस्ती करने वाले देश पर सख्त प्रतिबंध लगा सकता है। हालांकि, अभी EU में इस पर पूरा सहमति नहीं है और कई डिप्लोमैट्स ने कहा कि बातचीत से समस्या सुलझाने की कोशिश की जाएगी।

            EU काउंसिल के प्रमुख एंटोनियो कोस्टा ने इमरजेंसी EU समिट की घोषणा की है, जो गुरुवार को हो सकती है। उन्होंने कहा कि EU किसी भी तरह की जबरदस्ती के खिलाफ खुद का बचाव करने के लिए तैयार है।

            EU-US ट्रेड एग्रीमेंट को यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन बैठक के बाद कहा कि हम सब ग्रीनलैंड की संप्रभुता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम एकजुटता से इन चुनौतियों का सामना करेंगे।

            EU-US ट्रेड एग्रीमेंट को यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन बैठक के बाद कहा कि हम सब ग्रीनलैंड की संप्रभुता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम एकजुटता से इन चुनौतियों का सामना करेंगे।

            EU पर 15% अमेरिकी टैरिफ लगा है

            अमेरिका ने यूरोपीय यूनियन पर 15% टैरिफ लगा रखा है। 1 फरवरी से यह बढ़कर 25% हो जाएगा। हालांकि स्टील, कॉपर और एल्यूमीनियम के सामानों पर टैरिफ की दर 50% ही रहेगी।

            EU और अमेरिका के बीच मई 2025 में समझौता हुआ था, जिसके तहत EU को रियायत मिली थी। इसके बदले अगले 3 साल में अमेरिका से 750 बिलियन डॉलर, यानी करीब 64 लाख करोड़ रुपए की एनर्जी खरीदेगा।

            इसके साथ ही EU अमेरिका में 600 बिलियन डॉलर यानी 51 लाख करोड़ रुपए का निवेश करेगा। ये निवेश अमेरिका के फार्मा, ऑटो और डिफेंस सेक्टर में होना है। हालांकि, ट्रम्प से विवाद के बाद इस निवेश पर भी संकट मंडरा रहा है।

            ग्रीनलैंड को क्या ट्रम्प अमेरिका में मिला सकते हैं, नियम जानिए

            ट्रम्प ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने (खरीदने या कब्जा करने) की बात 2019 से ही कर रहे हैं। उनके दूसरे कार्यकाल में यह मुद्दा फिर से बहुत जोर पकड़ गया है। लेकिन कानूनी रूप से यह इतना आसान नहीं है।

            ग्रीनलैंड और अमेरिका दोनों ही NATO देश हैं। कानून के मुताबिक एक NATO देश दूसरे NATO देश पर कानूनी रूप से कब्जा नहीं कर सकता। ये पूरी तरह अवैध और NATO संधि के खिलाफ होगा।

            NATO का Article 5 कहता है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला है। अगर कोई बाहरी दुश्मन हमला करे तो सभी सदस्य मिलकर मदद करेंगे।

            ग्रीनलैंड पहले स्वतंत्र हो, फिर अमेरिका से जुड़े: ग्रीनलैंड अभी डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। 2009 के सेल्फ गवर्नमेंट एक्ट के तहत ग्रीनलैंड के लोग रेफरेंडम (जनमत संग्रह) करके स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए डेनिश संसद की भी मंजूरी जरूरी है।

            ग्रीनलैंड क्यों इतना खास…

            खास भौगोलिक स्थिति: ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच, यानी अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच के पास स्थित है। इसी वजह से इसे मिड-अटलांटिक क्षेत्र में एक बेहद अहम ठिकाना माना जाता है।

            रणनीतिक सैन्य महत्व: ग्रीनलैंड यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है।

            चीन और रूस पर नजर: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है।

            प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इनका 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।

            नई समुद्री व्यापारिक राहें: ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा।

            अमेरिकी सुरक्षा नीति: अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की “फ्रंट लाइन” मानता है। वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।


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