गुजरात: अहमदाबाद में ‘टेरेस टूरिज्म’ का ट्रेंड, पतंगबाजी के लिए छतों का किराया 1.5 लाख; पतंगें, खाना-पीना भी साथ; जितनी ज्यादा ऊंची छत, उतना ज्यादा किराया

              अहमदाबाद: मकर संक्रांति पर अहमदाबाद में ‘टेरेस टूरिज्म’ के ट्रेंड में तेजी आई है। इस साल भी अहमदाबाद के पोल, खाडिया और रायपुर इलाकों में सभी ऊंची छतें बुक हो चुकी हैं। छतों का किराया 20 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच गया है।

              ओल्ड अहमदाबाद में ज्यादातर परिवार अब विदेशों में बस गए हैं। इसलिए ये पतंगबाजी के साथ अपनी पुरानी यादें ताजा करने हर साल यहां आते हैं।

              अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट पर इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल की फोटो। यह फेस्टिवल 9 से 15 जनवरी तक चलेगा।

              अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट पर इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल की फोटो। यह फेस्टिवल 9 से 15 जनवरी तक चलेगा।

              अजय मोदी ने बताया- हमारी छत किराए पर पंजाबी फैमिली ने ली

              पोल इलाके में रहने वाले अजय मोदी ने बताया कि इस साल उनके यहां पंजाब से एक फैमिली आ रही हैं। वहीं, कई एनआरआई ने भी आसपास की छतें किराए पर ले चुके हैं। इस साल किराया 15 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच गया है।

              हम मेहमानों को पतंगों के साथ-साथ खाने-पीने का सामान भी उपलब्ध कराते हैं। इसमें उंधियू-पूरी, जलेबी, भजिया और तिल की चिक्की जैसे व्यंजन शामिल होते हैं। इसके अलावा मिनरल वाटर, बैठने के लिए छतों पर सोफे-कुर्सियां ​​और बुजुर्गों-बच्चों के आराम के लिए दो कमरे भी दिए जाते हैं।

              अजय भाई ने आगे बताया कि इस तरह के टेरेस टूरिज्म से न केवल मकान मालिकों को फायदा होता है, बल्कि आसपास के छोटे व्यापारियों को भी फायदा होता है। नाश्ते के स्टॉल, पतंग की डोर बेचने वाले और घरेलू उद्योग चलाने वाली महिलाएं (जो बाजरे के बड़े या अन्य स्नैक्स बनाती हैं) भी इन दो दिनों के दौरान 2,000 रुपए से 5,000 रुपए तक आसानी से कमा लेती हैं।

              जिग्नेशभाई ने कहा- छतें किराए पर देने-लेने का ट्रेंड 4-5 सालों से शुरु हुआ

              पोल इलाके के जिग्नेशभाई रामी ने बताया कि छतें किराए पर देने-लेने का ट्रेंड 4-5 सालों से शुरू हुआ है। अब तो यह अहमदाबाद में आम हो चुका है, जितनी ऊंछी छत, उसका उतना ही ज्यादा किराया।

              आमतौर पर छतों का एक दिन (चौबीस घंटे) का किराया 20 से 25 हजार रुपए होता है। मकर संक्रांति के आखिरी वक्त पर किराया लाखों में पहुंच जाता है। हम पतंगों के साथ-साथ सुबह-शाम का नाश्ता, दोपहर का खाना और रात का खाना भी उपलब्ध कराते हैं।

              अहमदाबाद में प्रवासी भारतीय के अलावा पतंगबाजी के लिए काफी संख्या में विदेशी भी आने लगे हैं। वैसे भी त्योहार का असली मजा लोगों के बीच में रहकर आता है। इसी के चलते विदेशी लोग भी होटलों बजाय हमारे इलाके चुनते हैं। इससे वे न सिर्फ त्योहार को एन्जॉय ही करते हैं, बल्कि करीब से भारतीय संस्कृति को देख पाते हैं। इसके अलावा उन्हें घर में रहने जैसी फीलिंग भी आती है।

              जिग्नेशभाई ने आगे बताया कि शाम से देर तक का नजारा तो देखने लायक होता है। इस दौरान छतों पर दिवाली की तरह शानदार आतिशबाजी भी देखने को मिलती है। पुरानी हवेलियां और छतें आपस में जुड़े होने के कारण वातावरण बेहद खुशनुमा हो जाता है।

              पुराने अहमदाबाद का कोट इलाका।

              पुराने अहमदाबाद का कोट इलाका।

              गीताबेन ने कहा- मकर संक्रांति से काफी आर्थिक मदद हो जाती है

              गीताबेन राणा ने बताया कि मेरे पति और मैं दोनों दिव्यांग हैं। मेरी बेटी भी बोल-सुन नहीं सकती। हम मध्यम वर्ग के लोग हैं। इसलिए घर खर्च के लिए छोटे-मोटे काम धंधे करते ही रहते हैं। इसीलिए हम भी विदेशियों दूर-दराज के लोग छत पर आते हैं, तो हम उन्हें छत किराए पर दे देते हैं।

              इस तरह, खाने-पीने के साथ प्रति व्यक्ति 3 से 4 हजार रुपए चार्ज करते हैं। दिव्यांगता के चलते हम उन्हें खाना नहीं दे सकते। इसलिए हम सिर्फ छत किराए पर देते हैं। इसीलिए मेहमानों से 2000 रुपए प्रतिदिन ही लेते हैं। इससे मुझे हर साल 20 से 30 हजार रुपए की मदद मिल जाती है।


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