KORBA : जन्म के बाद नहीं रोया नवजात, नई पद्धति से इलाज, कोरबा मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 13 दिनों तक चला इलाज; अत्याधुनिक उपकरण का हुआ इस्तेमाल

              कोरबा: जिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डिलीवरी के बाद नहीं रोने वाले नवजात बच्चों की नई पद्धति से इलाज शुरू की गई है। 1 मई को जन्मे नवजात की रोने की आवाज न आने पर नवीन पद्धति से उपचार के कारण मासूम के रोने की गूंज अस्पताल में सुनाई दी। एसएनसीयू में मासूम का उपचार डॉक्टरों के देखरेख में करीब 13 दिनों तक चलता रहा, जिससे वह पूरी तरह स्वस्थ हैं।

              जानकारी के मुताबकि, उरगा क्षेत्र में रहने वाले राजेश चंद्राकर की पत्नी दीप्ति चंद्राकर को 1 मई प्रसव पीड़ा शुरू हो गया। राजेश चंद्राकर अपनी पत्नी को प्रसव के लिए मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर पहुंचे। ड्यूटी में तैनात स्वास्थ्य कर्मियों ने प्रसूता का सामान्य डिलीवरी तो करा लिया, लेकिन जन्म के पांच मिनट बाद भी मासूम के मुंह से आवाज नहीं निकली।

              मासूम के इलाज में अत्याधुनिक उपकरण का इस्तेमाल

              इसके बाद स्वास्थ्य कर्मी मासूम को तत्काल एसएनसीयू (नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई) लेकर पहुंचे, जहां मेडिकल कॉलेज में शिशु रोग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हेमा नामदेव ने मासूम को एसएनसीयू में भर्ती करते हुए गहनता से जांच की। इसके बाद अपनी टीम के साथ मासूम का लाखों रुपए कीमती अत्याधुनिक उपकरण का इस्तेमाल नवीन पद्धति से उपचार शुरू कर दिया।

              लोगों को भारी भरकम खर्च से मिलेगी राहत

              मेडिकल कॉलेज सहायक प्राध्यापक डॉ. हेमा नामदेव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि अस्पताल में नवीन पद्धति से नवजात का उपचार शुरू किया गया है। इससे निश्चित तौर पर परिजनों को भारी भरकम खर्च से राहत मिलेगी। जिले के चुनिंदे अस्पताल में यह सुविधा उपलब्ध है। खर्च की बात करें तो प्रतिदिन औसतन 6000 रूपए होते हैं, जबकि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कोई खर्च नहीं है।

              पहली बार नवीन पद्धति से हुआ उपचार

              शिशु रोग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हेमा नामदेव ने बताया कि अस्पताल में नवीन पद्धति से पहली बार उपचार किया गया है इसके लिए लाखों रुपए कीमती दो अत्याधुनिक मशीन उपलब्ध हैं इसे मीरा कादल कहा जाता है। इस उपकरण की मदद से कंट्रोल तरीके से बच्चे को ठंडा किया जाता है जिसकी वजह से मस्तिष्क का मेटाबालिज्म कम हो जाता है और बच्चे पर आघात कम होता है।


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