नई दिल्ली: भारत अप्रैल महीने में रूस से 6 करोड़ बैरल कच्चा-तेल खरीदेगा, यह डिस्काउंट की जगह अब प्रीमियम पर मिलेगा; ईरान जंग के बीच सप्लाई सुधारने की कोशिश

          नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी इजराइल-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस संकट से निपटने के लिए भारतीय रिफाइनर्स ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदने का फैसला किया है।

          जानकारी के मुताबिक, अप्रैल महीने की डिलीवरी के लिए भारत ने रूस से लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल का सौदा किया है।

          स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावित होने के बाद भारत को सऊदी अरब और इराक से होने वाली सप्लाई में दिक्कत आ रही थी। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत अब फिर से रूसी तेल पर भरोसा जता रहा है।

          फरवरी के मुकाबले दोगुनी हुई रूसी तेल की खरीद

          डेटा इंटेलिजेंस फर्म केपलर के मुताबिक, अप्रैल के लिए रूस से की गई यह खरीदारी फरवरी के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है। हालांकि, यह मात्रा मार्च के लगभग बराबर ही है।

          मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण सप्लाई रुकने से भारतीय कंपनियां अब उन रास्तों को तलाश रही हैं, जहां से तेल की सप्लाई बिना किसी रुकावट के हो सके। इसी वजह से पिछले कुछ हफ्तों में रूसी तेल की मांग में अचानक तेजी आई है।

          क्रूड से 15 डॉलर तक महंगा मिल रहा रूसी तेल

          हैरानी की बात यह है कि जो रूसी तेल कभी भारत को भारी डिस्काउंट पर मिलता था, अब उसके लिए प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सौदे ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम (अतिरिक्त कीमत) पर बुक किए गए हैं। सप्लाई की कमी और मांग ज्यादा होने की वजह से कीमतों में यह उछाल देखा जा रहा है।

          अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी

          भारत की इस खरीदारी के पीछे अमेरिका द्वारा दी गई एक विशेष छूट का बड़ा हाथ है। अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को लेने की अनुमति दी है, जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे।

          बाद में इस छूट का दायरा बढ़ाकर 12 मार्च कर दिया गया। यह छूट विशेष रूप से इसलिए दी गई ताकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पैदा हुई तेल की किल्लत को दूर किया जा सके।

          सऊदी और इराक का तेल खाड़ी देशों में फंसा

          पिछले साल के अंत में अमेरिकी दबाव के कारण भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी थी और सऊदी अरब व इराक जैसे देशों की ओर रुख किया था। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद इन देशों का अधिकांश तेल ‘पर्शियन गल्फ’ के अंदर ही फंस गया है।

          नई दिल्ली के अधिकारियों को उम्मीद है कि जब तक होर्मुज में स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक अमेरिका अपनी छूट की समय सीमा को आगे बढ़ाता रहेगा।

          MRPL-हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी की बाजार में वापसी

          दिसंबर से रूसी तेल से दूरी बनाने वाली भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां अब फिर से एक्टिव हो गई हैं। मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों ने रूसी बाजार में वापसी की है। इन कंपनियों का फोकस अब घरेलू मांग को पूरा करने के लिए स्टॉक जमा करने पर है।

          वेनेजुएला से भी आयात बढ़ा, 4 साल का रिकॉर्ड टूटा

          सिर्फ रूस ही नहीं, भारत अपनी तेल की जरूरतों के लिए वेनेजुएला पर भी निर्भरता बढ़ा रहा है। केपलर के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में वेनेजुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 8 मिलियन बैरल तक पहुंच सकता है। यह अक्टूबर 2020 के बाद का उच्चतम स्तर है। भारत अपनी सप्लाई को डाइवर्सिफाई करने के लिए दक्षिण अमेरिकी देशों से भी संपर्क बढ़ा रहा है।

          डिमांड के कारण रूस को अच्छा मुनाफा हो रहा

          भारत और चीन जैसे देशों की बढ़ती मांग और ऊंची कीमतों के कारण रूस को अच्छा मुनाफा हो रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट रेवेन्यू रूस इसी समय कमा रहा है। मार्च 2022 के बाद रूसी तेल की मांग और कमाई अपने हाई पर है।

          मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि भारत के पास अभी रूस के अलावा कोई बेहतर विकल्प नहीं है, क्योंकि वेनेजुएला की क्वालिटी रूसी तेल जैसी नहीं है और मिडिल ईस्ट का रास्ता असुरक्षित है।



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