Saturday, February 28, 2026

              रायपुर : तिरिया में प्राकृतिक पर्यटन और आजीविका संवर्धन का नया मॉडल

              रायपुर: बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर से लगे ग्राम तिरिया ने सामुदायिक प्रयासों के माध्यम से प्राकृतिक पर्यटन एवं आजीविका संवर्धन का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकार प्राप्त होने के पश्चात् ग्राम सभा तिरिया द्वारा पर्यावरण संरक्षण तथा ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में निरंतर कार्य किया जा रहा है।

              इसी क्रम में बीते 27 जुलाई को ग्राम सभा एवं सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति के संयुक्त तत्वावधान में तिरिया संगम पिकनिक स्पॉट में व्यापक पौधरोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह प्राकृतिक पर्यटन स्थल ग्राम सभा द्वारा संचालित है, जहाँ ग्रामीणों द्वारा पर्यटकों के लिए बाँस से निर्मित नौका (बैम्बू राफ्टिंग) एवं पिकनिक जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

              वन अधिकार पत्र प्राप्त होने से पूर्व भी ग्रामवासी जंगल की सुरक्षा हेतु 23-23 सदस्यों की गश्ती टीमों का गठन कर सक्रिय रहते थे, किन्तु इससे ग्रामीणों को स्थायी आय का साधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। ऐसी स्थिति में ग्राम सभा की बैठक में सर्वसम्मति से तिरिया संगम को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का सृजन करना था।

              पिछले दो वर्षों से पर्यटकों से संग्रहित शुल्क का उपयोग वर्ष 2025 में आम, जामुन, आँवला, बेर, नारियल, बादाम, कचनार, बांस, कदम्ब, नीम एवं विभिन्न फूल तथा औषधीय पौधों सहित मिश्रित प्रजातियों के पौधे क्रय एवं रोपण हेतु किया गया। यह पौधरोपण केवल पर्यटन स्थल तक सीमित न रहकर नालों के किनारे-किनारे भी किया गया है। इससे आगामी वर्षों में हरित आवरण में वृद्धि के साथ-साथ फलों एवं औषधीय पौधों के माध्यम से अतिरिक्त आय उपलब्ध होने की संभावना है। ग्राम सभा की इस अभिनव पहल की प्रशंसा करते हुए वन विभाग द्वारा भी विभिन्न प्रकार के पौधे प्रदान किए गए, जिनका रोपण उसी पर्यटन परिसर में ग्रामवासियों द्वारा किया गया।

              ग्राम तिरिया का यह सामुदायिक प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है, बल्कि इस बात का सशक्त प्रमाण भी है कि जब स्थानीय समुदायों को अधिकार एवं संसाधन प्रदान किए जाते हैं, तो वे क्षेत्रीय विकास तथा प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह मॉडल निश्चित रूप से अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अनुकरणीय है। 


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