रायपुर : माड़पाल के बूढ़ा तालाब में उपजी खुशहाली, मछुआ समूह की बदली तकदीर

              रायपुर (BCC NEWS 24): सरकारी योजनाओं के माध्यम से मछुआरा समुदाय की तकदीर सच में बदल रही है। यह आत्मनिर्भरता, उन्नत तकनीक और अच्छी आय का एक नया दौर है। मछुआरे परंपरागत तरीकों की जगह वैज्ञानिक तरीकों, जैसे- बायोफ्लॉक, केज कल्चर, और उन्नत डबरी निर्माण को अपना रहे हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत तालाब निर्माण, आइस बॉक्स, और अन्य उपकरणों के लिए अनुदान दिया जा रहा है। इसके अलावा, किसान क्रेडिट कार्ड और समूह दुर्घटना बीमा योजना का लाभ मिल रहा है। बस्तर का वनांचल अब केवल चुनौतियों के लिए नहीं, बल्कि बदलाव की नई कहानियों के लिए पहचाना जा रहा है। दंतेवाड़ा जिले के गीदम विकासखंड अंतर्गत ग्राम माड़पाल में एक सुखद बदलाव देखने को मिला है। यहाँ प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना ने न केवल एक अनुपयोगी तालाब को पुनर्जीवित किया, बल्कि ग्रामीणों के लिए आर्थिक समृद्धि के द्वार भी खोल दिए हैं।

              योजना का संबल अनुदान से जागी उम्मीद

              माड़पाल का बूढ़ा तालाब लंबे समय से उपेक्षित और अनुपयोगी पड़ा था। इस स्थिति को बदलने के लिए प्रशासन ने मछुआ समूह को प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना से जोड़ा गया। समूह को फिंगरलिंग (मत्स्य बीज) पर 50 प्रतिशत अनुदान दिया गया। केवल बीज ही नहीं, बल्कि तालाब की सफाई, वैज्ञानिक रखरखाव और मछली पालन के आधुनिक तरीकों की ट्रेनिंग भी दी गई।

              कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक प्रबंधन

              अनुदान और सही मार्गदर्शन मिलने के बाद समूह के सदस्यों ने इसे एक मिशन के रूप में लिया। पिछले 6-7 महीनों से मछली पालन की बारीकियों, जैसे समय पर चारा देना और पानी की गुणवत्ता बनाए रखना, समूह की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। जो तालाब कभी बेकार था, वह उनकी मेहनत से उम्मीदों का केंद्र बन गया।

              सफलता का स्वाद बाजार में बढ़ी मांग

              हाल ही में बूढ़ा तालाब में पहला बड़ा मत्स्याखेट (Harvesting) किया गया। तालाब से बड़ी मात्रा में स्वस्थ और ताजी मछलियाँ निकलीं। इन मछलियों को तुरंत स्थानीय बाजारों में भेजा गया, जहाँ गुणवत्ता अच्छी होने के कारण इन्हें हाथों-हाथ लिया गया। अच्छी बिक्री से समूह के सदस्यों को न केवल बेहतर दाम मिले, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ गया।

              प्रेरणा का केंद्र बना माड़पाल

              माड़पाल की यह सफलता अब आसपास के गाँवों के लिए मिसाल बन गई है। गाँव के अन्य युवा भी अब पारंपरिक कार्यों के साथ-साथ मत्स्य पालन को एक गंभीर व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं। माड़पाल की यह कहानी सिद्ध करती है कि यदि शासन की योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो और उसे मेहनत का साथ मिले, तो नक्सल प्रभावित और दुर्गम इलाकों में भी समृद्धि की नई लहर लाई जा सकती है। बूढ़ा तालाब् अब केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि माड़पाल की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है।


                              Hot this week

                              रायपुर : विशेष लेख : ई-ऑफिस का विस्तार : छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यसंस्कृति में डिजिटल क्रांति का आगाज

                              "पारदर्शिता की नई पहचान 'ई-ऑफिस'रायपुर (नितेश चक्रधारी, सहायक जनसंपर्क...

                              रायपुर : फसलों को खरपतवार के संकट से बचाने रायपुर में देश भर के वैज्ञानिकों का महाकुंभ

                              इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय खरपतवार प्रबंधन...

                              Related Articles

                              Popular Categories