वॉशिंगटन डीसी: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने को लेकर खुली धमकी दी है। BBC के मुताबिक, उन्होंने कहा कि अगर किसी देश ने ग्रीनलैंड पर कब्जे वाले प्लान में उनका साथ नहीं दिया तो वे उन देशों पर टैरिफ लगाएंगे।
ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस में एक बैठक के दौरान यह बयान दिया। हालांकि, उन्होंने साफ नहीं किया कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाएगा और इसके लिए वह किस कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
दूसरी ओर कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने शुक्रवार को कहा कि ग्रीनलैंड के मालिकाना हक का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नहीं है। NATO देश होने के नाते ग्रीनलैंड के तरफ हमारी जिम्मेदारी बरकरार है।
उन्होंने कहा, “ग्रीनलैंड का भविष्य ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोगों का फैसला है।” कार्नी ने नाटो सहयोगियों, खासकर अमेरिका से कहा कि वे अपने वादों का सम्मान करें।
ट्रम्प बोले- गोल्डन डोम प्रोजेक्ट के लिए ग्रीनलैंड जरूरी
ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को गोल्डन डोम नामक बड़े रक्षा प्रोजेक्ट के लिए भी अहम बताया है। गोल्डन डोम अमेरिका का मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट है।
यह इजराइल के आयरन डोम से प्रेरित है। गोल्डन डोम का मकसद चीन, रूस जैसे देशों से आने वाले खतरे से अमेरिका को बचाना है।
ट्रम्प ने बताया कि अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर NATO से भी बातचीत कर रहा है। ट्रम्प पहले भी कह चुके हैं कि NATO को अमेरिका का साथ देना चाहिए। अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कंट्रोल नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपना असर बढ़ा सकते हैं, जो किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अमेरिकी संसद की टीम ग्रीनलैंड पहुंची
ट्रम्प के बयान के वक्त अमेरिकी संसद का एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल ग्रीनलैंड के दौरे पर था। इस 11 सदस्यीय टीम का नेतृत्व डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स कर रहे हैं। इसमें रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस और लिसा मर्कोव्स्की भी शामिल हैं।
प्रतिनिधिमंडल ने ग्रीनलैंड के सांसदों के अलावा डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन से मुलाकात की।
टीम का मकसद स्थानीय लोगों की बात सुनना और वॉशिंगटन में तनाव कम करना है। सीनेटर कून्स ने कहा, ‘हम ग्रीनलैंड के लोगों की सुन रहे हैं और उनकी राय लेकर वापस जाएंगे, ताकि स्थिति शांत हो।’
ग्रीनलैंड की सांसद आजा चेमनित्ज ने कहा, ‘हमें दोस्तों और सहयोगियों की जरूरत है। अमेरिका 2019 से दबाव बना रहा है। यह एक लंबी दौड़ है, जो अभी खत्म नहीं हुई। जितना ज्यादा समर्थन मिले, उतना अच्छा।” उन्होंने उम्मीद जताई कि यह मुलाकात फायदेमंद साबित होगी।

अमेरिकी कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल 16 जनवरी को डेनमार्क कोपेनहेगन स्थित संसद में पहुंचा। बाएं से दाएं (सामने): सीनेटर डिक डरबिन, मैडलीन डीन, सीनेटर क्रिस कून्स और आजा चेम्निट्ज, सीनेटर थॉम टिलिस, सीनेटर पीटर वेल्च और सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की।
ग्रीनलैंड को लेकर दो गुट में बंटे अमेरिकी सांसद
अमेरिकी सीनेटर मर्कोव्स्की ने ग्रीनलैंड को जबरन लेने के खिलाफ संसद में एक बिल पेश किया है। वहीं, एक रिपब्लिकन सांसद ने ग्रीनलैंड को जोड़ने के पक्ष में दूसरा बिल पेश किया।
ट्रम्प के विशेष दूत जेफ लैंड्री ने फॉक्स न्यूज को बताया कि अमेरिका को ग्रीनलैंड के नेताओं से सीधे बात करनी चाहिए, न कि डेनमार्क से। उन्होंने कहा, ‘ट्रम्प गंभीर हैं। जल्द ही सौदा हो जाएगा।’
बुधवार को डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्जफेल्ट ने व्हाइट हाउस में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की थी।
एक डेनिश अधिकारी ने BBC से कहा कि सैन्य कार्रवाई की कोई बात नहीं हुई, लेकिन ट्रम्प के बयानों को गंभीरता से लिया जा रहा है।

अमेरिकी सांसद कांग्रेसमैन रैंडी फाइन ने 12 जनवरी को ‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड बिल’ पेश किया, जो अभी हाउस और सीनेट दोनों में पास होना बाकी है।
ग्रीनलैंड पर चर्चा के लिए वर्किंग ग्रुप बनेगा
व्हाइट हाउस में बुधवार को हुई बातचीत में डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ। हालांकि, बैठक के बाद तीनों पक्षों ने ग्रीनलैंड से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए एक संयुक्त वर्किंग ग्रुप बनाने पर सहमति जताई, जिसकी बैठकें आने वाले हफ्तों में होंगी।
रासमुसेन ने साफ कहा कि अमेरिका के साथ असहमति बनी हुई है। हमारा रुख काफी अलग है। उन्होंने ट्रम्प के ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जा करने के विचार को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। उन्होंने कहा, ‘हमने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि यह डेनमार्क के हित में नहीं है।’
उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देश आर्कटिक में सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार हैं। इसमें ग्रीनलैंड में ज्यादा अमेरिकी सैन्य अड्डे बनाने की संभावना भी शामिल है।
यूरोपीय देश डेनमार्क के समर्थन में आए, सैनिक भेज रहे
यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में कदम बढ़ाए हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, नीदरलैंड और ब्रिटेन ग्रीनलैंड में एक निगरानी मिशन के तहत सीमित संख्या में सैनिक भेज रहे हैं।
जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने में डेनमार्क का समर्थन करने के लिए 13 लोगों की एक टीम भेजेगा।
वहीं, स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने बुधवार को कहा कि डेनमार्क के कहने पर स्वीडिश आर्म्ड फोर्स के कई अधिकारियों को एक सैन्य अभ्यास में शामिल होने के लिए ग्रीनलैंड भेजा गया है।
ट्रम्प बोले- संधि या लीज नहीं, ग्रीनलैंड पर पूरा कंट्रोल चाहिए
ट्रम्प का कहना है कि रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी के कारण ग्रीनलैंड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि सिर्फ संधि या लीज से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरा कंट्रोल चाहिए। इससे और सुविधाएं मिलेंगी।
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने मंगलवार को कहा कि उनकी टीम ग्रीनलैंड पर कंट्रोल करने के कई तरीके तलाश रही है, जिनमें सैन्य बल का इस्तेमाल भी शामिल है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनलैंड की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया गया तो अमेरिका को ‘कुछ करना ही पड़ेगा’।

ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के पीछे की वजह इस इलाके में रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी को बताया।
ट्रम्प की टैरिफ डिप्लोमेसी, दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं
ट्रम्प अपने दूसरे टर्म में टैरिफ की धमकियां दे रहे हैं। इसके जरिए वे जियोपॉलिटिकल मुद्दों, जैसे जंग रोकना, क्षेत्रीय नियंत्रण, या राष्ट्रीय सुरक्षा को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये धमकियां अक्सर नेगोशिएशन या दबाव बनाने के लिए दी जाती हैं। ट्रम्प ने अब तक कई मौकों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है।
- भारत-पाकिस्तान संघर्ष रोकने के लिए ट्रम्प ने कई बार (कम से कम 60+ बार) दावा किया कि यह उनकी टैरिफ धमकी के बाद रुकी।
- ईरान से ट्रेड करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने का ऐलान किया।
- रूस से ऑयल खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ। 2025 में भारत पर एक्सट्रा 25% टैरिफ लगाया।
- वेनेजुएला/कोलंबिया जैसे लैटिन अमेरिकी देशों पर ड्रग्स/इमिग्रेशन के लिए टैरिफ लगाने की धमकी।
ग्रीनलैंड को क्या ट्रम्प अमेरिका में मिला सकते हैं, नियम जानिए
ट्रम्प ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने (खरीदने या कब्जा करने) की बात 2019 से ही कर रहे हैं। उनके दूसरे कार्यकाल में यह मुद्दा फिर से बहुत जोर पकड़ गया है। लेकिन कानूनी रूप से यह इतना आसान नहीं है।
ग्रीनलैंड और अमेरिका दोनों ही NATO देश हैं। कानून के मुताबिक एक NATO देश दूसरे NATO देश पर कानूनी रूप से कब्जा नहीं कर सकता। ये पूरी तरह अवैध और NATO संधि के खिलाफ होगा।
NATO का Article 5 कहता है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला है। अगर कोई बाहरी दुश्मन हमला करे तो सभी सदस्य मिलकर मदद करेंगे।
ग्रीनलैंड पहले स्वतंत्र हो, फिर अमेरिका से जुड़े: ग्रीनलैंड अभी डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। 2009 के सेल्फ गवर्नमेंट एक्ट के तहत ग्रीनलैंड के लोग रेफरेंडम (जनमत संग्रह) करके स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए डेनिश संसद की भी मंजूरी जरूरी है।
85% लोगों ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया
साल 2025 में एक सर्वे में 85 प्रतिशत लोगों ने अमेरिकी कब्जे का विरोध किया था। 1951 का छोटा रक्षा समझौता 2004 में अपडेट किया गया था, जिसमें ग्रीनलैंड की सेमी-ऑटोनॉमस सरकार को शामिल किया गया, ताकि अमेरिकी सैन्य गतिविधियां स्थानीय लोगों को प्रभावित न करें।
इस समझौते की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई, जब डेनमार्क नाजी कब्जे में था और उसके वॉशिंगटन दूत ने अमेरिका के साथ ग्रीनलैंड के लिए रक्षा समझौता किया। उन्हें डर था कि नाजी ग्रीनलैंड को अमेरिका पर हमले के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
उस समय अमेरिकी सैनिकों ने द्वीप पर कई बेस बनाए और जर्मनों को हटाया। युद्ध के बाद अमेरिका ने कुछ बेस अपने पास रखे, लेकिन कोल्ड वॉर खत्म होने पर ज्यादातर बंद कर दिए। अब अमेरिका के पास सिर्फ पिटुफिक स्पेस बेस बचा है, जो मिसाइल ट्रैकिंग करता है।
डेनमार्क की भी वहां हल्की मौजूदगी है, जैसे डॉग स्लेज वाली स्पेशल फोर्सेस। हाल में डेनमार्क ने अपना बेस अपग्रेड करने का वादा किया है।
ग्रीनलैंड क्यों इतना खास…
- खास भौगोलिक स्थिति: ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच, यानी अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच के पास स्थित है। इसी वजह से इसे मिड-अटलांटिक क्षेत्र में एक बेहद अहम ठिकाना माना जाता है।
- रणनीतिक सैन्य महत्व: ग्रीनलैंड यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है।
- चीन और रूस पर नजर: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है।
- प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इनका 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
- नई समुद्री व्यापारिक राहें: ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा।
- अमेरिकी सुरक्षा नीति: अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की “फ्रंट लाइन” मानता है। वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।

(Bureau Chief, Korba)





