वॉशिंगटन डीसी: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नील नदी के पानी को लेकर मिस्र और इथियोपिया के बीच चल रहे विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की है। ट्रम्प ने कहा है कि वह दोनों देशों के बीच अमेरिकी मध्यस्थता को दोबारा शुरू करने के लिए तैयार हैं।
ट्रम्प ने यह बात मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी को लिखे एक पत्र में कही। यह पत्र ट्रम्प के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर भी पोस्ट किया गया है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने पत्र में लिखा कि वह नील नदी के जल बंटवारे के सवाल को जिम्मेदारी से और स्थायी तौर पर सुलझाने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता फिर से शुरू करने को तैयार हैं।

ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर मध्यस्थता कराने की जानकारी दी।
5 अरब डॉलर से बना डैम विवाद की वजह
मिस्र और इथियोपिया के बीच विवाद की बड़ी वजह इथियोपिया की ग्रैंड इथियोपियन रिनेसां डैम (GERD) है।
करीब 5 अरब डॉलर की लागत से यह बांध नील नदी की सहायक ब्लू नील नदी पर बनाया गया है। इथियोपिया ने 9 सितंबर को इस बांध का उद्घाटन किया था। इसके बाद से मिस्र में नाराजगी है।
इथियोपिया इस बांध को अपनी आर्थिक तरक्की के लिए बेहद अहम मानता है। इथियोपिया की आबादी 12 करोड़ से ज्यादा है और वह अफ्रीका का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है।
वहीं मिस्र का कहना है कि यह बांध अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन करता है। मिस्र को आशंका है कि इससे देश में सूखे और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इथियोपिया इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
ट्रम्प ने पहले कार्यकाल में मध्यस्थता कराई थी
अमेरिका ने 2019 के अंत से फरवरी 2020 की शुरुआत तक मिस्र और इथियोपिया के बीच नील नदी जल बंटवारे पर औपचारिक मध्यस्थता कराई थी।
यह प्रक्रिया तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में शुरू हुई। बातचीत अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट और वर्ल्ड बैंक की मौजूदगी में वॉशिंगटन में हुई।
मिस्र को आशंका थी इथियोपिया की GERD परियोजना से नील नदी का प्रवाह घटेगा। इससे पानी की कमी, कृषि पर असर, सूखे और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
फरवरी 2020 में अमेरिका ने एक ड्राफ्ट एग्रीमेंट तैयार कराया। मिस्र ने इस मसौदे पर सहमति जता दी, लेकिन इथियोपिया ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इसके बाद अमेरिका की मध्यस्थता प्रक्रिया ठप हो गई
2020 में ट्रम्प ने सार्वजनिक तौर पर मिस्र के पक्ष में बयान दिए थे। इसी के चलते इथियोपिया ने अमेरिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे।
मिस्र की जीवनरेखा है नील नदी
नील नदी मिस्र के लिए सिर्फ एक जलस्रोत नहीं, बल्कि देश की जीवनरेखा है। रेगिस्तानी इलाके वाले मिस्र में पीने का पानी, खेती, उद्योग और बिजली सब कुछ नील नदी पर टिका हुआ है। यही वजह है कि नील से जुड़ा कोई भी विवाद मिस्र के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन जाता है।
मिस्र की करीब 11 करोड़ आबादी की 90 से 95% पानी जरूरतें नील नदी से पूरी होती हैं। देश का लगभग 90% से ज्यादा इलाका रेगिस्तान है, जहां प्राकृतिक वर्षा बेहद कम होती है। ऐसे में नील नदी ही एकमात्र स्थायी जल स्रोत है, जो मिस्र को जीवन देता है।
खेती के लिहाज से भी नील की भूमिका अहम है। मिस्र की करीब 95% खेती योग्य जमीन नील नदी और इसके डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। देश की कुल ताजा पानी खपत का 80–85% हिस्सा कृषि में जाता है, जो सीधे नील से आता है।
पानी की मात्रा में थोड़ी भी कमी होने पर गेहूं, चावल और अन्य खाद्य फसलों पर असर पड़ सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
जलसंकट का सामना कर रहा मिस्र
मिस्र पहले से ही जल संकट की स्थिति में है। 1959 के जल समझौते के तहत मिस्र को नील से हर साल 55.5 अरब क्यूबिक मीटर पानी मिलता है।
यह मात्रा उस समय तय हुई थी, जब आबादी काफी कम थी। आज हालात यह हैं कि मिस्र में प्रति व्यक्ति सालाना जल उपलब्धता 600 क्यूबिक मीटर से भी नीचे आ चुकी है, जबकि संयुक्त राष्ट्र 1,000 क्यूबिक मीटर से कम को जल संकट की श्रेणी में रखता है।
नील नदी का असर सिर्फ गांव और खेतों तक सीमित नहीं है। काहिरा और अलेक्जेंड्रिया जैसे बड़े शहरों की पानी सप्लाई नील पर निर्भर है। इसके अलावा असवान हाई डैम से मिलने वाली जलविद्युत भी इसी नदी से जुड़ी है, जो मिस्र की ऊर्जा जरूरतों में अहम भूमिका निभाती है।
इन्हीं वजहों से मिस्र सरकार नील नदी से जुड़े हर घटनाक्रम को बेहद संवेदनशील मानती है। जल प्रवाह में अनिश्चितता, डैम संचालन या लंबे समय तक पानी रोके जाने की आशंका को मिस्र सीधे तौर पर अस्तित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा खतरा मानता है।

(Bureau Chief, Korba)





